Home छत्तीसगढ़ सामाजिक न्याय और संघर्ष में साहित्य की महती भूमिका

सामाजिक न्याय और संघर्ष में साहित्य की महती भूमिका

0

तमिलनाडु में होगा 19वां राष्ट्रीय अधिवेशन

मुंबई से लौटकर हरनाम सिंह

दक्षिण एशिया में लेखकों के सबसे बड़े संगठन अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के 90वें वर्ष में प्रवेश पर, समाज सुधारक ज्योतिबा फुले की 200 वें जन्म दिवस एवं मणिपुर में प्रलेस के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में मुंबई में दो-दिवसीय सेमिनार का आयोजन संपन्न हुआ। इस अवसर पर प्रलेसं राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भी आयोजित हुई जिसमें संगठन संबंधी अनेक फैसले लिए गए। देश के विभिन्न प्रान्तों हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरलम, झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, गुजरात एवं उत्तर प्रदेश से आए संगठन के प्रतिनिधियों ने अपने समय की पहचान और चुनौतियों को समझते हुए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर गहन विचार-विमर्श किया। आयोजन में अनेक प्रस्ताव पारित किए गए इनमें फ़लस्तीन और ईरान की जनता के आज़ादी और संप्रभुता की रक्षा के लिए किए जा रहे वहाँ की जनता के आंदोलन के साथ एकजुटता ज़ाहिर करते हुए अमेरिका एवं इजरायल की युद्ध नीति की निंदा की। देश में तेजी से विस्तारित होते फ़ासिज़्म के खतरे के बीच मणिपुर की पीड़ित अवाम के प्रति भी अपनी एकजुटता व्यक्त की गई।
दो-दिवसीय सेमिनार का शुभारंभ सीपीआई के महासचिव डी राजा ने प्रलेसं की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले सज्जाद ज़हीर की सुपुत्री और विख्यात नाटककार नादिरा बब्बर, प्रलेसं के राष्ट्रीय अध्यक्ष पी. लक्ष्मीनारायणा, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस के राजन बावडेकर, प्रलेसं महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष जी के आइनापुरे की उपस्थिति में किया।
भारत के संदर्भ में सामाजिक न्याय और संघर्ष में साहित्य की भूमिका
विषय पर प्रलेसं के राष्ट्रीय महासचिव सुखदेव सिंह सिरसा, सचिव मंडल सदस्य विनीत तिवारी, महाराष्ट्र प्रलेसं के कार्यवाहक अध्यक्ष यश पाटिल, महासचिव राकेश वानखेड़े आदि ने भी अपने विचार रखे।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए डी. राजा ने कहा कि देश कठिन दौर से गुजर रहा है। हमारे सामने अनेक चुनौतियां हैं और ऐसे में लेखकों पर बड़ी जिम्मेदारी है। संस्कृतिकर्मी और लेखक मानवीय मूल्यों के प्रति संघर्षरत हैं। वर्तमान में जारी युद्ध के हम प्रत्यक्षदर्शी हैं, जिसमें हजारों बेगुनाह लोग मारे जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप स्वयं को तानाशाह समझते हैं। हमारे देश का प्रधानमंत्री उसी के इशारे पर चल रहा है। सभी तानाशाहों की तरह ट्रंप को भी पराजित होना होगा।
महात्मा ज्योतिबा फुले के बारे में डी. राजा ने कहा कि वे जातिवाद के विरोध एवं मानवीय स्वतंत्रता और गरिमा के लिए लड़े थे। ऐसी ही भूमिका सावित्रीबाई की भी थी। भीमराव आम्बेडकर ने कहा था कि महिलाओं की प्रगति में ही समाज की प्रगति निहित है। इंसानियत की लड़ाई अभी भी समाप्त नहीं हुई है।
महाराष्ट्र के राकेश वानखेड़े ने कहा कि महात्मा फुले के पश्चात के 200 वर्ष आसान नहीं थे। इंसानी भेदभाव समाप्त करने की लड़ाई आज भी जारी है।
इंदौर के विनीत तिवारी ने कहा कि कपड़ों से पहचाने जाने के नफरती और हिंसक जुमले गढ़ने वालों को हम बता देना चाहते हैं कि फिलिस्तीन और मणिपुर का गमछा ओढ़ कर हम उनकी पहचान को अपनी पहचान से जोड़कर गौरवान्वित हैं। फिलिस्तीन की आजादी और मणिपुर में अमन के लिए ये गमछे आपसी एकता के प्रतीक बन गए हैं। 1935 में कलाकारों लेखकों ने प्रगतिशील लेखक संघ की नींव रखी थी। इस विरासत को हम आगे बढ़ा रहे हैं। वेनेजुएला और क्यूबा हमें संघर्ष और आजादी के लिए प्रेरित करते हैं। गजा में बमों की बरसात के बीच भी कलाकारों ने उम्मीद को जिंदा बनाए रखा है। हमारे शासक मणिपुर को ईरान और फ़लस्तीन बनाना चाहते हैं और ख़ुद इजरायल बनना चाहते हैं, ऐसा हम होने नहीं देंगे।
महात्मा फुले तथा अन्य समकालीन सामाजिक सुधार आंदोलनों का साहित्य पर प्रभाव
विषय पर आंध्र प्रदेश के डा. वल्लूरु शिवप्रसाद, तमिलनाडु के डॉ .एसके गंगा, तेलंगाना की डॉ. अवधेश रानी, डॉ. डी अरम केरलम के वल्ली कावू मोहनदास, महाराष्ट्र के प्रज्ञा दया पंवार, किशोर मांदलेआदि ने अपने विचार रखे।
सम्मेलन के दूसरे दिन के पहले सत्र में भारतीय साहित्य संस्कृति पर वामपंथी विचारधारा का प्रभाव विषय पर प्रमुख वक्ता भोपाल के कुमार अंबुज ने कहा कि कला, कला के लिए नहीं, जीवन के लिए है। वाम विचारधारा बताती है कि जीवन विकसित होता है। प्रेमचंद द्वारा प्रगतिशील लेखक संघ के लखनऊ अधिवेशन में दिया गया भाषण आज भी प्रासंगिक है। वह लेखकों के लिए प्रकाश स्तंभ है। ऐसा ही उनका 1935 में फिल्मों पर दिया गया भाषण भी है । कुमार अंबुज के अनुसार कृष्ण चंदर ने वाम विचारधारा के माध्यम से ही कहानियां लिखी। इस आधार पर फिल्म धरती का लाल बनी थी। कला की प्रतिबद्धता समाज की प्रतिबद्धता से जुड़ी है। दृष्टि के बिना लेखक अंधा होता है। इप्टा ने नाटकों को आंदोलन का स्वरूप दिया है। फिल्म निर्माण में ऋतिक घटक, मृणाल सेन वाम विचारधारा से ही प्रेरित थे। कई भारतीय भाषाओं में वैचारिकता आधारित फिल्में बन रही है और मुकदमे भी लड़े जा रहे हैं।

किसी काल में भाऊ समर्थ ने प्रगतिशील कलाकार संघ बनाया था। श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी की फिल्में भी वामपंथ से ही प्रभावित थी। हम यथार्थ को अभिव्यक्त करते हैं। जीवन से कला को लेते हैं। आपके इतिहास ने ही आपका वर्तमान बनाया है। लेखक कोई भौतिक वस्तु नहीं दे सकता है, वह भविष्य का स्वप्न और नजरिया दे सकता है। मुक्तिबोध ने कहा था कि जीवन की आलोचना और व्याख्या जरूरी है। जीवन विवेक ही साहित्य विवेक है। सौंदर्यबोध की नई भाषा गढ़ना होगी। विवेकहीन आज्ञाकारिता को रोकना जरूरी है। इस पर पर लेखकों को सवाल उठाना चाहिए। साहित्य जीवन संग्राम की भाषा है।

काशी विश्वविद्यालय उत्तर प्रदेश की प्राध्यापिका वंदना चौबे के अनुसार जीवन में द्वंद्ववादी नजरिया होना चाहिए। नैतिकता के आधार पर दुनिया नहीं बदलती। नैतिक मूल्य स्वायत्त नहीं हैं, वे वर्गीय व्यवस्था के अधीन है। पहचान की राजनीति से देश को बहुत नुकसान हुआ है। समाज में कई अंत:विरोध हैं इनमें से मुख्य अंत:विरोध को पहचानना होगा। दुनिया का हृदय परिवर्तन करना संभव नहीं है।
झारखंड के रणेन्द्र कुमार ने कहा कि वाम विचारधारा का चित्रकला पर व्यापक असर हुआ है। अभिजात्य चित्रकला में आमजन को स्थान मिला है। बंगाल के अकाल पर आबेदीन ने चित्र बनाएं, चित्तोप्रसाद चट्टोपाध्याय ने उसे आगे बढ़ाया। 1947 में प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स एसोसिएशन बनी। चित्रकला को विदेशी और अभिजात्य से मुक्त करवाया गया। हिंदी फिल्मों के मुकाबले दक्षिण भारत की फिल्मों में दलितों के सवाल आज भी उठाए जा रहे हैं। वामपंथ ने संस्कृति के सभी स्वरूपों को प्रभावित किया है।
आंध्रप्रदेश के वेलपुला नारायणा ने कहा कि विचारधारा को लेकर विद्यार्थियों के बीच काम करने की जरूरत है। गुजरात के रामसागर सिंह परिहार के अनुसार गुजरात की पहचान केवल मोदी और शाह से नहीं है। गुजरात को अन्य कई प्रगतिशील प्रवृत्तियों से भी जाना जाता है।
बिहार के डॉ. रवीन्द्रनाथ राय ने कहा कि वामपंथ ने अपनी समृद्ध परंपरा से सीखा है। अंधविश्वासों के खिलाफ कबीर हमारे मार्गदर्शक रहे हैं। साहित्य जीवन की आलोचना है। प्रेमचंद ने कहा था कि हमें सौंदर्य की कसौटी को बदलना होगा। देश में भक्ति आंदोलन के बाद बड़े आंदोलन के रूप में प्रगतिशील आंदोलन को ही माना गया है।

प्रगतिशील लेखक संघ की 90 वर्ष की यात्रा- योगदान और भविष्य का मार्ग
विषय पर आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए प्रलेसं के राष्ट्रीय महासचिव हरियाणा के सुखदेव सिंह सिरसा में कहा कि प्रगतिशील लेखक संघ के गठन के समय फासीवाद का खतरा था आज भी वही स्थिति है। देश और दुनिया में बड़ी लड़ाइयां नजर आती है। जीवन में बेरोजगारी, महंगाई के विरुद्ध जारी संघर्षों को महत्व नहीं मिलता। प्रलेसं केवल साहित्यिक संगठन नहीं है, यह सांस्कृतिक आंदोलन के साथ ही पुनर्जागरण का आंदोलन भी है। यह आंदोलन प्रलेसं के गठन के पूर्व से ही लड़ा जा रहा है। प्रलेसं प्रगतिशील आंदोलन का अकेला झंडाबरदार नहीं है। अन्य कई मानवतावादी संगठन भी इससे जुड़े हुए हैं। वामपंथ पर जो हमला हो रहा है उससे हम अकेले नहीं लड़ सकते। प्रलेसं के 90 साल के इतिहास में ही आजादी की लड़ाई भी लड़ी गई थी। उसे दौर में प्रलेसं की भूमिका सामंत शाही से लेकर साम्राज्यवाद के खिलाफ तक थी। संस्कृति के क्षेत्र में हम रूढ़िवादी विचारधारा से कैसे लड़े ? यह सवाल आज भी बना हुआ है। हम तर्कशीलता की परंपरा से आए हैं। पंजाब में किसान आंदोलन से हमने सीखा और समझा, तभी वहां सत्ता परिवर्तित हुई। सोवियत संघ के पतन के बाद प्रलेसं और इप्टा भी कमजोर हुई है। पहले दुश्मन नजर आता था अब वह नहीं दिखता है। बदलते दौर में हमें अपनी भाषा और लहजा बदलना होगा सरमायेदारी, कॉर्पोरेट के माध्यम से दुनिया को लूट रही है। जब मार्क्स को पढ़ा भी नहीं गया था तब भी लोग अन्याय- असमानता से लड़ रहे थे।

उत्तर प्रदेश से आए डॉक्टर संजय श्रीवास्तव ने कहा कि प्रलेसं के विकास में उर्दू लेखकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन आज संगठन में उर्दू हाशिये पर है। प्रलेसं में विभिन्न आंचलिक बोलियों और लोक संस्कृति की भी उपेक्षा हुई है।

मध्य प्रदेश के जाहिद खान ने कहा की तरक्कीपसंद तहरीक में उर्दू का योगदान रहा है। बिहार के सत्येंद्र कुमार के अनुसार लेखकों को जनता के आंदोलन से जुड़ना चाहिए। पूंजीवाद और सामंतवाद से लड़ने की हमारी परंपरा रही है। पंजाब के डॉक्टर हरविंदर सिंह ने प्रलेसं के पुरखों को याद करते हुए युवा पीढ़ी को लेखन, पठन-पाठन की ओर प्रेरित करने, प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने का आग्रह किया।

छत्तीसगढ़ की उषा आठले वैरागकर ने कहा कि दमन के खिलाफ वैचारिक लड़ाई चतुराई के साथ लड़ना होगी। हमें अपने सहयोगी और विरोधी संगठनों में अंतर को पहचानना होगा। प्रतिरोध के नए औजार गढ़ने होंगे ।छत्तीसगढ़ के ही नथमल शर्मा के अनुसार हम तेजी से बदलने वाले भयावह और चुनौती पूर्ण समय में रह रहे हैं। उन्होंने बताया कि बस्तर में समानता की लड़ाई आज भी जारी है। बस्तर सुलग रहा है। संसाधनों पर नज़र है । सत्र में बिहार की डॉक्टर पूनम सिंह, तेलंगाना के टी एस नटराजन ने भी संबोधित किया।

अंतिम सत्र में शांति आंदोलन में प्रगतिशील लेखक संघ की भूमिका विषय पर प्रमुख वक्ता हरियाणा के स्वर्ण सिंह विर्क ने अपने विचार रखें। उन्होंने अनेक लेखकों, कवियों की रचनाओं के उद्धरणों से विषय को प्रतिपादित किया। भोपाल की आरती ने कहा कि मध्यप्रदेश में हमारी पीढ़ी सुकून वाली पीढ़ी है, जो युद्ध और प्राकृतिक विभिषिका से अप्रभावित है। अतीत में हमारे पुरखों ने जो माहौल बनाया उसी को हम आगे बढ़ा रहे हैं। युद्ध से संपूर्ण मानवता प्रभावित हो रही है।

इंदौर की सारिका श्रीवास्तव के अनुसार जिस तरह युद्ध के खिलाफ बोलना जरूरी है, उसी तरह ऊपर से शांत और अंदर से सुलग रहे विरोध को के स्वरों को दबाकर जो शांति बनाई जा रही है उसके खिलाफ भी बोलने की जरूरत है। हम ऐसे समय में एकत्र हुए हैं जब शांति शब्द संदिग्ध सा लगता है। पंजाब के कुलदीप सिंह दीप ने कहा कि युद्ध के पीछे कुछ लोगों के मुनाफे की हवस होती है। हथियार बनाने वाली कंपनियां देशों को युद्ध की ओर धकेलती हैं। 20वीं शताब्दी संघर्षों की सदी रही है, इसे खूनी शताब्दी के नाम से भी जाना जाता है।

फिल्म निर्माता निर्देशक आनंद पटवर्धन ने कहा कि अमेरिका और इसराइल को परमाणु बम अपने पास रखने से रोका जाए। अकेले ईरान पर प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है। सारी दुनिया से परमाणु शस्त्र समाप्त होना चाहिए। हमें संस्कृति मोर्चे पर सक्रिय रहने की जरूरत है। फारूक अफरीदी तेलंगाना से वैलपुला नारायण ने भी संबोधित किया

विभिन्न सत्रों में इप्टा और प्रलेसं से वर्षों से जुड़े रहे कलाकारों, उनकी विरासत को संभाल रहे परिजनों को याद किया गया। नादिरा बब्बर के साथ ही इप्टा के साथी फिल्म निर्देशक रमेश तलवार, लता मंगेशकर पुरस्कार प्राप्त संगीतकार कुलदीप सिंह, प्रसिद्ध गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के सुपुत्र दिलीप सुल्तानपुरी और विख्यात निर्माता निर्देशक आनंद पटवर्धन को सम्मानित किया गया

शोक प्रस्ताव
सम्मेलन में गत वर्ष हैदराबाद में संपन्न अखिल भारतीय प्रलेसं कार्यकारिणी की बैठक के पश्चात संगठन एवं देश के प्रमुख कला एवं लेखन से जुड़े महानुभावों के निधन पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

सम्मेलन परिसर में प्रलेसं इंदौर इकाई की ओर से अशोक दुबे द्वारा निर्मित पोस्टर एवं विनीत तिवारी द्वारा गजा़ के कलाकारों के चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई। सेमिनार में अनेक पुस्तकों का विमोचन भी हुआ। समाधान इंगले, अमरजीत बाहेती ने प्रगतिशील कवियों के गीत गाए‌ । झारखंड से आए ज्योति शेखर मल्लिक के सुपुत्र स्नेहज मल्लिक ने भरतनाट्यम नृत्य के माध्यम से दिवंगत लेखकों को श्रद्धांजलि अर्पित की

संगठन सत्र में विभिन्न राज्य इकाइयों ने अपनी-अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। संगठन के संविधान समीक्षा पर विनीत तिवारी द्वारा ड्राफ्ट प्रस्तुत किया गया।

विभिन्न मुद्दों पर पी. लक्ष्मीनारायणा, सुखदेव सिंह सिरसा, विनीत तिवारी, संजय श्रीवास्तव कुमार, कुमार अंबुज, प्रेमचंद गांधी, नथमल शर्मा, राकेश वानखेडे, वंदना चौबे, पूनम सिंह, रणेंद्र और हरनाम सिंह ने अपने विचार रखें। प्रगतिशील लेखक संघ का 19 वां राष्ट्रीय अधिवेशन तमिलनाडु में होने की जानकारी दी गई।

प्रस्ताव जो पारित हुए

सेमिनार के अंतिम सत्र में विभिन्न प्रस्ताव पर चर्चा पश्चात उन्हें सर्वानुमति से पारित घोषित किया गया। प्रस्तावों में अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए युद्ध का विरोध, मणिपुर में शांति बहाली, सरकार की शिक्षा नीति का विरोध, जम्मू कश्मीर के राज्यपाल द्वारा 25 पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाने का विरोध, वॉइस ऑफ हिंद रजब फिल्म के भारत में प्रदर्शन पर रोक लगाने का विरोध किया गया। एक अन्य प्रस्ताव में किसान आंदोलन के दौरान किसानों पर थोपे गए झूठे मुकदमा वापस लेने की मांग के साथ देश की जेलों में अनेक वर्षों से बंद बुद्धिजीवियों एवं गरीब दलितों-आदिवासियों को रिहा करने की मांग का प्रस्ताव भी पारित किया गया।

बहुभाषी कवि सम्मेलन

सेमिनार समाप्ति के पूर्व पंजाब के प्रसिद्ध कवि सुरजीत सिंह जज की अध्यक्षता में बहुभाषिक कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ सम्मेलन में युद्ध के विरुद्ध दुनिया विषय पर कुमार अंबुज, प्रेमचंद गांधी, डॉक्टर पूनम सिंह, हरिओम राजोरिया, नथमल शर्मा, अनिल करमेले, आरती, विनीत तिवारी, वंदना चौबे, सारिका श्रीवास्तव, डॉक्टर प्रज्ञा दया पवार ,परमेश्वर वैष्णव, अक्षय शिंपी, दविंधर धर, कुलदीप सिंह दीप, पुंडलिक तायडे, श्यामल गरुड़, योगिनी राउल, अकबर अहमद आदि ने अपनी कविताएं प्रस्तुत की। संचालन समाधान इंगले ने किया आभार माना अमरजीत बाहेती ने।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here