
उज्जैन
भगवान शिव को प्रिय सावन महीने के दूसरे सोमवार पर 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर में भस्म आरती के लिए मंदिर के कपाट तड़के 2:30 बजे खोले गए। सभा मंडप में शिव के गण वीरभद्र के कान में स्वस्ति वाचन कर आज्ञा ली गई, फिर चांदी का पट खोलकर कर्पूर आरती उतारी गई।
जल से भगवान महाकाल का अभिषेक करने के बाद दूध, दही, घी, शक्कर, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से पूजन किया गया। रजत चंद्र, त्रिशूल, मुकुट और आभूषणों के साथ भांग, चंदन और ड्रायफ्रूट का श्रृंगार कर भस्म चढ़ाई गई। शेषनाग का रजत मुकुट, रजत की मुंडमाल और रुद्राक्ष की माला के साथ-साथ फूलों की माला धारण कराई गई। फल और मिठाई का भोग लगाया गया।
वहीं, तीर्थनगरी ओंकारेश्वर में ज्योतिर्लिंग का महाश्रृंगार करने के बाद महाभोग लगाया गया। जबलपुर में 33 किलोमीटर की संस्कार कावड़ यात्रा शुरू हो चुकी है।
आज सावन सोमवार के साथ प्रदोष का संयोग भी बना है। इसके चलते मध्य प्रदेश के शिवालयों में लगातार श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने पहुंच रहे हैं। उज्जैन में पिछले सोमवार को 6.13 लाख श्रद्धालुओं ने बाबा महाकाल के दर्शन किए थे।
जबलपुर में 35 किमी की ‘संस्कार कांवड़ यात्रा’
श्रावण के दूसरे सोमवार को संस्कारधानी में आस्था और प्रकृति संरक्षण का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। मां नर्मदा के पवित्र जल को कांवड़ में लेकर हजारों श्रद्धालु 10 अगस्त को 35 किलोमीटर की ‘संस्कार कांवड़ यात्रा’ पर निकलेंगे। यात्रा का उद्देश्य केवल भगवान शिव का जलाभिषेक करना नहीं, बल्कि ‘प्रेम, पेड़ और पानी-मानव जीवन की निशानी’ का संदेश जन-जन तक पहुंचाना भी है।
यात्रा में मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव भी शामिल होंगे। यात्रा की शुरुआत सुबह सात बजे सिद्धघाट, ग्वारीघाट से होगी। छह वर्षों से अखंड निराहार साधना कर रहे महायोगी दादागुरु के सानिध्य और आमंत्रित अतिथियों की मौजूदगी में मां नर्मदा एवं भगवान शिव के दुग्धाभिषेक के बाद कांवड़ तथा देववृक्षों का पूजन-अर्चन किया जाएगा। इसके बाद समर्थ वाणी के साथ कांवड़ यात्रा अपने गंतव्य की ओर रवाना होगी। आयोजकों का दावा है कि लाखों श्रद्धालु इस यात्रा से जुड़ चुके हैं और लगभग 300 धार्मिक-सामाजिक संस्थाएं तथा संगठन इसके स्वागत में सहभागी होते हैं।
नर्मदा जल लेकर 35 किमी का सफर
यात्रा ग्वारीघाट से रामपुर चौक, छोटी लाइन फाटक, शास्त्री ब्रिज, तीन पत्ती, मालवीय चौक, लार्डगंज, बड़ा फुहारा, सराफा, लकड़गंज, बेलबाग, घमापुर, कांचघर चौक, सतपुला, गोकुलपुर, रांझी और खमरिया स्टेट होते हुए मटामर स्थित कैलाश धाम पहुंचेगी। यहां चमत्कारिक अखिलेश्वर महादेव का नर्मदा जल से अभिषेक किया जाएगा। साथ ही शिव स्वरूप माने जाने वाले देववृक्षों की स्थापना कर प्रकृति संरक्षण का संकल्प दिलाया जाएगा।
कांवड़ को मिला प्रकृति उपासना का नया स्वरूप
संस्कार कांवड़ यात्रा के संयोजक शिव यादव और अध्यक्ष नीलेश रावल के अनुसार, कांवड़ यात्रा की परंपरा भगवान शिव के जलाभिषेक से जुड़ी प्राचीन सनातन परंपरा है। इसी परंपरा को संस्कार कांवड़ यात्रा ने प्रकृति संरक्षण से जोड़ने का प्रयास किया है।
कांवड़ में नर्मदा जल के साथ देववृक्षों को शामिल कर यह संदेश देने की कोशिश है कि जल और वृक्ष दोनों जीवन के आधार हैं।
दादागुरु के मार्गदर्शन में कांवड़ को प्रकृति, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ने की पहल की गई है।
आयोजकों का कहना है कि शिव की सगुण उपासना का अर्थ केवल मंदिर तक सीमित न रहकर प्रकृति में शिव तत्व को पहचानना भी है। इसी विचार के साथ यात्रा में ‘पेड़ बचाओ, पानी बचाओ और स्वच्छ भारत-समर्थ भारत’ का संदेश दिया जाएगा।
छह वर्षों से अखंड साधना
आयोजकों ने बताया कि महायोगी दादागुरु पिछले छह वर्षों से अखंड निराहार महान्नत साधना कर रहे हैं। उनके सानिध्य में आयोजित यह यात्रा श्रद्धा के साथ सामाजिक और पर्यावरणीय चेतना का संदेश भी देगी।
संस्कार कांवड़ यात्रा समिति के संयोजक शिव यादव, अध्यक्ष नीलेश रावल, जगत बहादुर सिंह अन्नू और भारत सिंह यादव, राजेश यादव, राजेन्द्र मिश्रा, कमलेश सिंह, पवन यादव, गौरैया यादव, धर्मेंद्र नामदेव, प्रमोद पाठक, रामरतन यादव, महेश पसीने, संदीप वर्मा, प्रो. अजिंक्य फाटक, वेदांश तिवारी, सौरभ चौरसिया सहित विभिन्न संगठनों और संस्थाओं ने श्रद्धालुओं से यात्रा में सहभागी बनने का आह्वान किया।


