
कई युवा प्रोफेशनल्स के लिए आज भी हर महीने एक लाख रुपये कमाना एक बड़ी उपलब्धि लगती है लेकिन जब सैलरी वाकई में बैंक अकाउंट में आती है, तो बात कुछ अलग होती है. किराया, EMI, राशन, ट्रैवल, बिल और पारिवारिक जिम्मेदारियां आपकी आय का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर देती हैं, जिससे बचत के लिए उम्मीद से बहुत कम पैसे बचते हैं.
यह बात खासकर उन लोगों के लिए है, जो शहरों में अकेले रहते हैं क्योंकि हर महीने के जरूरी खर्च काफी ज्यादा हो सकते हैं. इसलिए कागज पर 1 लाख रुपये की सैलरी भले ही बड़ी लगे लेकिन महीने के आखिर तक इसका पूरा पैसा बचत या आर्थिक आराम में नहीं बदलता.इसे लेकर चर्चा इसलिए भी तेज है क्योंकि 25 साल के एक कर्मचारी ने रेडिट पर पोस्ट शेयर किया है जिसमें उन्होंने 1 लाख रुपये की सैलरी पर कई बातें सामने रखी हैं.
पोस्ट में क्या-क्या?
25 साल के कर्मचारी ने रेडिट पर पोस्ट कर बताया कि हर महीने बैंक अकाउंट में एक लाख रुपये आने के बाद भी सभी खर्चों के बाद महीने के आखिरी में उसके पास 20 हजार रुपये की बचते हैं. अच्छी सैलरी होने के बाद भी उन्होंने 6 महीने में केवल 1.2 लाख रुपये ही बचाए हैं.
कहां जाते हैं पैसे?
कर्मचारी ने बताया कि 1 लाख रुपये की सैलरी कहां चली जाती है पता ही नहीं चलता. उन्होंने बताया कि 25,000 रुपये कार लोन, 25,000 रुपये किराया और 6000 रुपये की बीमा लिया है. इसके बाद खाने-पीने पर 10 हजार रुपये खर्च होते हैं. जबकि पेट्रोल और बिजली पानी पर 5000 और 3000 रुपये खर्च होते हैं.
पिता पर 8 लाख का खर्च
लेकिन उससे ही बड़ी बात ये थी कि कर्मचारी पर परिवार की जिम्मेदारियां भी शामिल हैं. पोस्ट में कर्मचारी ने बताया कि उनके पिता पर 8 लाख रुपये का कर्ज था, जिसे चुकाने में वह उनकी मदद करना चाहते थे लेकिन कम बचत की वजह से वह उनकी मदद नहीं कर पाए. लेकिन अब उन्हें एक और चिंता सताई जा रही है और वह ये है कि सीमित बचत की वजह से नौकरी छूट जाने पर उनके पास खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं हैं.
बदल रहा है सैलरी को लेकर ट्रेंड
कैटलाइज की संस्थापक अमनीत कौर सहदरा कहती हैं कि केवल 1 लाख रुपये की सैलरी ही युवा पेशेवरों के लिए वित्तीय आराम की पूरी तस्वीर नहीं देता है. उन्होंने कहा कि आवास की लागत बढ़ रही है, वहीं खाने, आने-जाने और मनोरंजन जैसे रोजमर्रा के खर्चे भी लगातार बढ़ रहे हैं. हेल्थ और शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ते महंगाई से लोगों पर और ज्यादा दबाव बढ़ा है.
ज्यादा सैलरी का मतलब आर्थिक सुरक्षा नहीं
कर्मचारी ने आगे पोस्ट में बताया कि यह दबाव तब और भी ज्यादा हो जाता है, जब युवा घरों से निकलकर स्वतंत्र रूप से पैसों का मैनेजमेंट करते हैं. एनजीएस ग्लोबल इंडिया के मैनेजिंग पार्टनर आशीष धवन ने कहा कि माता-पिता के साथ रहते हुए 1 लाख रुपये कमाने और किसी बड़े शहर में अकेले रहते हुए उतने ही पैसे कमाने में बहुत फर्क होता है.
धवन ने आगे बताया कि 1 लाख रुपये की सैलरी कागज पर भले ही बड़ी लगे लेकिन महीने के आखिर तक यह एक मीडिल क्लास के व्यक्ति की सैलरी जैसी रह जाती है. उन्होंने बताया कि किराया, राशन, आने-जाने का खर्च, बिजली-पानी का बिल, बीमा और दूसरे जरूरी खर्च सैलरी मिलने के बाद बची रकम को तेजी से कम कर देते हैं.
उन्होंने कहा कि युवा प्रोफेशनल जरूरी नहीं कि बिना सोचे-समझे पैसे खर्च कर रहे हों. असल में शहरों में प्रोफेशनल लाइफस्टाइल को बनाए रखने का खर्च बढ़ गया है और लोगों की जरूरतें के साथ-साथ उम्मीदें भी बढ़ी हैं. अब सैलरी से सिर्फ घर का जरूरी खर्च चलाने की उम्मीद नहीं होती. इसी पैसे से निवेश, हेल्थ इंश्योरेंस, माता-पिता की मदद, ट्रैवल, फिटनेस, गैजेट और दूसरी चीजों का खर्च भी पूरा करना होता है.
सैलरी से ज्यादा की चाहत
आर्थिक स्थिति का असर कर्मचारियों की करियर से जुड़ी उम्मीदों पर भी पड़ रहा है. सहद्रा ने कहा कि युवा प्रोफेशनल अब सिर्फ अच्छी सैलरी नहीं चाहते. वे नौकरी में लचीलापन, आगे बढ़ने के मौके, नई चीजें सीखने का अवसर, मेंटल हेल्थ और सुरक्षित भविष्य भी देखते हैं. ये सभी चीजें अब नौकरी चुनने और करियर का मूल्य समझने में अहम हो गई हैं.
धवन ने भी कहा कि लचीलापन, वर्क-लाइफ बैलेंस, करियर ग्रोथ, सीखने के मौके और अच्छा मैनेजर भी नौकरी की वैल्यू बढ़ाते हैं, भले ही इनका असर सीधे सैलरी स्लिप में न दिखे.
इसका मतलब है कि कंपनियों को कर्मचारियों को बनाए रखने के लिए सिर्फ सैलरी बढ़ाने पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. अच्छे फायदे, करियर में आगे बढ़ने के मौके, सीखने की सुविधा और काम में लचीलापन भी कर्मचारियों के लिए नौकरी की अहमियत तय करते हैं.
केवल सैलरी के मायने नहीं
कई युवा भारतीयों के लिए अब वित्तीय सफलता का मतलब केवल एक तय सैलरी तक पहुंचना नहीं है. उनके लिए यह इस बात से भी जुड़ा है कि वे अचानक आने वाले खर्चों को संभाल सकें, परिवार की मदद कर सकें और जरूरत पड़ने पर नौकरी बदलने या करियर से ब्रेक लेने के लिए उनके पास पर्याप्त बचत हो, ताकि उन्हें तुरंत आर्थिक परेशानी का सामना न करना पड़े. धवन ने भी आगे बताया कि अब वित्तीय सुरक्षा का मतलब अपने पास विकल्प होना भी है. यानी कोई इमरजेंसी आने पर उसका सामना कर पाना, छुट्टी ले पाना या ज्यादा कर्ज लिए बिना करियर से जुड़े फैसले ले पाना भी उतना ही जरूरी हो सकता है, जितना ज्यादा सैलरी कमाना.
इसलिए 1 लाख रुपये की सैलरी वित्तीय स्थिति का सिर्फ एक हिस्सा बताती है. अगर कोई युवा प्रोफेशनल परिवार के साथ रहता है, तो उसकी सैलरी का बड़ा हिस्सा बच सकता है. वहीं, अगर किसी पर किराया, EMI और परिवार के खर्च की जिम्मेदारी है, तो इतनी ही सैलरी में महीने के आखिर में काफी कम पैसा बच सकता है.
लेकिन आज के युवा खर्च और नौकरी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं. युवा प्रोफेशनल अब करियर की सफलता को सिर्फ इस आधार पर नहीं देखते कि वे कितना कमाते हैं. वे यह भी देखते हैं कि उनकी कमाई से उन्हें कितनी वित्तीय स्थिरता, लचीलापन और बेहतर लाइफस्टाइल जीने का मौका देती है. 2026 के डेलॉयट जेन जेड और मिलेनियल सर्वे में भी युवा भारतीयों पर पड़ रहे वित्तीय दबाव की तस्वीर सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 54% जेन जेड और 44% मिलेनियल्स ने कहा कि उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति के कारण जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों को टाल दिया है.
सर्वे में शामिल 60% से ज्यादा लोगों ने कहा कि घर का खर्च उठाना उनके करियर से जुड़े फैसलों को प्रभावित करता है. वहीं, 20% जेनरेशन जेड और 13% मिलेनियल्स ने कहा कि उन्हें हर महीने अपने रोजमर्रा के खर्च पूरे करने में परेशानी होती है.


