
जगदलपुर.
बस्तर दशहरा में रथ खींचने की परंपरा जितनी अनूठी है, उतना ही दिलचस्प है विजय रथ की चोरी का विधान. हजारों लोगों की मौजूदगी के बीच माड़िया आदिवासी विजय रथ को चुराकर कुमड़ाकोट जंगल ले जाते हैं. शहर से करीब तीन किलोमीटर दूर रथ को ले जाने के पीछे सदियों पुरानी सामाजिक परंपरा जुड़ी हुई है.
मान्यता के अनुसार, पहले रथ खींचने वाले आदिवासियों को राजा के साथ बैठने और भोजन करने का अवसर नहीं मिलता था. इसे अपने सम्मान से जोड़कर ग्रामीणों ने रथ चोरी की परंपरा शुरू की. भीतर रैनी के दिन मावली माता की परिक्रमा के बाद आठ पहियों वाले विजय रथ को कुमड़ाकोट ले जाया जाता है. इसके बाद राज परिवार को रथ चोरी की सूचना दी जाती है और उसे वापस लाने की प्रक्रिया शुरू होती है. बाहर रैनी के दिन राज परिवार कुमड़ाकोट पहुंचकर लाड़ी यानी पारंपरिक झोपड़ी में नवाखानी का विधान निभाता है.
इस दौरान ग्रामीणों के साथ प्रसाद ग्रहण करने और उनका कुशलक्षेम पूछने की परंपरा भी निभाई जाती है. इसके बाद माता दंतेश्वरी के छत्र को रथ पर विराजित कर राज परिवार सात परिक्रमा करता है. फिर विजय रथ को वापस राजमहल के सामने लाया जाता है. बस्तर दशहरा की यह परंपरा केवल रथ की वापसी नहीं, बल्कि सामाजिक समानता और आदिवासी सम्मान का संदेश भी देती है.


