
लखनऊ
बोतलबंद पानी की गुणवत्ता में खामियों पर राज्य सरकार ने सख्ती बढ़ा दी है। अब मिनरल वाटर और बोतलबंद पेयजल की नई विनिर्माण इकाइयों को भारतीय मानक ब्यूरो (बीआइएस) का प्रमाणन (सर्टिफिकेशन) मिलने के बाद लाइसेंस जारी किया जाएगा।
पहले से संचालित 968 इकाइयों को 31 मार्च 2027 तक प्रमाणन लेना होगा। तय समयसीमा में प्रमाणन नहीं लेने वाली इकाइयों का लाइसेंस या पंजीकरण निलंबित कर उत्पादन बंद कराया जाएगा। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) ने पिछले एक वर्ष में 811 इकाइयों के निरीक्षण और 660 नमूनों की जांच के बाद यह कदम उठाया है।
जांच में 513 नमूने गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे थे। इनमें 176 नमूने स्वास्थ्य के लिए असुरक्षित पाए गए। इस आधार पर 152 इकाइयों के लाइसेंस या पंजीकरण निलंबित किए गए हैं, जबकि केंद्रीय लाइसेंस प्राप्त 55 इकाइयों के लाइसेंस निलंबित करने की संस्तुति केंद्र सरकार से की गई है।
खनिजों की मात्रा सामान्य स्तर से मिली कम
एफएसडीए के संयुक्त आयुक्त हरिशंकर सिंह ने बताया कि असुरक्षित नमूनों में ई-कोलाई, कोलीफार्म बैक्टीरिया, यीस्ट और मोल्ड जैसे सूक्ष्मजीव पाए गए। वहीं, अधोमानक नमूनों में कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे खनिजों की मात्रा सामान्य स्तर से कम मिली।
निरीक्षण के दौरान कुछ इकाइयों में आवश्यक फिल्टर, पराबैंगनी किरणों से शोधन (यूवी) और ओजोनीकरण की सुविधाओं का भी अभाव मिला। इन खामियों के आधार पर कार्रवाई की गई है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2024 में आइएसआइ प्रमाणन की अनिवार्यता समाप्त किए जाने के बाद बीआइएस प्रमाणन की शर्त भी हटा दी गई थी।
इसके बाद प्रदेश में बोतलबंद पानी की विनिर्माण इकाइयों की संख्या बढ़कर 968 हो गई। गुणवत्ता और शोधन व्यवस्था में कमियां सामने आने के बाद प्रमाणन को फिर अनिवार्य करने का निर्णय लिया गया है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की आयुक्त डा. रोशन जैकब के अनुसार, बोतलबंद पेयजल की शुद्धता सीधे जनस्वास्थ्य से जुड़ी है। इसलिए सभी विनिर्माण इकाइयों में गुणवत्ता मानकों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है।


